मल मास का महत्व (हिन्दू धर्म में)
मल मास को अधिक मास या पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। यह चंद्र और सूर्य वर्ष के अंतर को संतुलित करने के लिए जोड़ा जाता है।
⭐ मल मास का आध्यात्मिक महत्व
यह अत्यंत पवित्र और फलदायी मास माना जाता है।
इसे भगवान विष्णु को समर्पित किया गया है, इसलिए इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा गया।
पाप कर्मों का नाश
मल मास में की गई पूजा, व्रत, दान, जप—सभी का फल कई गुना बढ़कर मिलता है।
इसे आध्यात्मिक शुद्धि का महीना माना जाता है।
मनोकामना पूर्ति
इस मास में की गई प्रार्थना, व्रत और तप—मनोकामनाओं की पूर्ति करवाते हैं।
कहा जाता है कि साधारण महीनों की तुलना में मल मास में इच्छा जल्दी पूर्ण होती है।
विष्णु भक्ति का श्रेष्ठ समय
इस महीने में विष्णु सहस्त्रनाम, गीता पाठ, नारायण कवच, हरि मंत्र जप अत्यंत शुभ माना जाता है।
मल मास, जिसे अधिक मास, पुरुषोत्तम मास, लौंध मास, या अधिमास भी कहा जाता है, हिन्दू पंचांग का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अतिरिक्त मास है। यह चंद्र और सूर्य कैलेंडर के बीच चल रहे समय-अंतर को संतुलित करने के लिए जोड़ा जाता है। लगभग प्रत्येक 32.5 महीनों में एक अतिरिक्त महीना आता है, जिसे मल मास कहा जाता है। यद्यपि शब्द “मल” का अर्थ अशुद्ध या अतिरिक्त माना जाता है, परंतु यह महीना धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ, फलदायी, और आध्यात्मिक उन्नति देने वाला माना गया है। हिन्दू धर्मग्रंथों में जहाँ इसे प्रारंभ में अशुभ बताया गया है, वहीं बाद में इसे पुरुषोत्तम मास की उपाधि मिली, अर्थात वह महीना जिसमें भगवान विष्णु स्वयं इसे श्रेष्ठ बना देते हैं। इस प्रकार मल मास का महत्व लोक-जीवन से लेकर आध्यात्मिक साधना तक अत्यंत व्यापक है।
1. मल मास का उद्भव और वैज्ञानिक पृष्ठभूमि
हिन्दू पंचांग दो आधारों पर चलता है—
सौर (सूर्य आधारित), और
चंद्र (चंद्र आधारित)
सौर वर्ष लगभग 365 दिन का होता है, जबकि चंद्र वर्ष लगभग 354 दिनों का। दोनों में लगभग 11 दिनों का अंतर प्रतिवर्ष बढ़ता रहता है। यह अंतर करीब ढाई साल में 1 महीने (लगभग 29.5 दिन) जितना हो जाता है। इस अंतर को संतुलित करने के लिए पंचांग में एक अतिरिक्त महीना जोड़ दिया जाता है, जिसे अधिक मास या मल मास कहते हैं।
यह जोड़ निरंतरता बनाए रखने, ऋतुओं को सही समय पर आने और त्योहारों को सही तिथियों पर रखने के लिए आवश्यक है। यदि अधिक मास न जोड़ा जाए तो कुछ वर्षों में दीवाली गर्मियों में और होली वर्षा ऋतु में पड़ने लगेगी।
इस प्रकार यह मास केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि कैलेंडर को संतुलित रखने के लिए वैज्ञानिक रूप से आवश्यक है।
2. मल मास की धार्मिक कथा और पौराणिक महत्व
पौराणिक कथा के अनुसार, जब पंचांग बनाया गया तो प्रत्येक मास को एक देवता के संरक्षण में रखा गया। किन्तु अधिक मास या यह अतिरिक्त महीना किसी देवता के भाग में नहीं आया। इस कारण इसे ‘मल मास’ कहा जाने लगा और यह अपने आप को उपेक्षित व अपवित्र समझने लगा। यह भगवान विष्णु के पास जाकर बोला—
“हे प्रभु! कोई भी देवता मुझे स्वीकार नहीं करता। सभी शुभ कर्मों से मुझे दूर रखा जाता है। मानव भी मेरे महीने में विवाह, नए कर्म, या शुभ कार्य नहीं करते। कृपया मेरी रक्षा करें।”
भगवान विष्णु ने मल मास पर कृपा की और कहा—
“आज से यह मास अशुभ नहीं रहेगा। मैं स्वयं इस माह का देवता बनकर इसे पुरुषोत्तम मास का दर्जा देता हूँ। जो भी व्यक्ति इस माह में मेरी पूजा, जप, तप, दान, उपवास करेगा, उसे सामान्य महीनों से कहीं अधिक फल प्राप्त होगा।”
इस प्रकार मल मास अपवित्र से अत्यंत पवित्र मास बन गया। यही कारण है कि आज भी इसे भगवान विष्णु को समर्पित मास के रूप में माना जाता है।
3. मल मास का आध्यात्मिक महत्व
(i) साधना का श्रेष्ठ समय
अधिक मास को “आध्यात्मिक पुनर्जागरण” का महीना कहा गया है। इस दौरान प्रकृति में एक विशिष्ट सामंजस्य और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है।
जप तेज़ी से सिद्ध होता है
मंत्र जल्दी फल देते हैं
मन अधिक स्थिर रहता है
आत्मिक शुद्धि आसानी से होती है
इस माह में साधारण व्यक्ति भी साधना के माध्यम से अपनी मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति कर सकता है।
(ii) पापों का नाश
धर्मग्रंथ कहते हैं कि इस महीने का एक दिन का तप भी सामान्य समय के कई वर्षों के तप के बराबर फल दे सकता है।
जैसे:
विष्णु सहस्त्रनाम का जप
गीता पाठ
राम नाम का जप
हरि स्तोत्र और भजन
इनके द्वारा व्यक्ति कर्मजन्य पापों से मुक्त होकर आत्मिक शांति प्राप्त करता है।
(iii) इच्छा-पूर्ति का मास
पुरुषोत्तम मास में की गई प्रार्थना और व्रत को मनोकामना पूर्ति के लिए श्रेष्ठ माना गया है।
लोग इस महीने में निम्न इच्छाओं के लिए संकल्प लेते हैं—
- विवाह
- संतान
- नौकरी
- धन
- घर
- व्यापार में सफलता
कहते हैं कि भगवान विष्णु इस महीने में भक्तों की विशेष सुनवाई करते हैं।
4. मल मास में क्या नहीं करते?
यद्यपि यह महीना धार्मिक रूप से शुभ है, फिर भी सामाजिक और पारिवारिक शुभ कार्य परंपरागत रूप से इस महीने में नहीं किए जाते। इसका कारण यह नहीं कि यह महीना अशुभ है, बल्कि इसलिए कि यह सिर्फ आध्यात्मिक साधना के लिए सुरक्षित किया गया है।
निम्न कार्य नहीं किए जाते:
- विवाह
- गृह प्रवेश
- नामकरण
- मुंडन संस्कार
- नई दुकान का उद्घाटन
- भवन निर्माण की शुरुआत
- बड़े मांगलिक कार्य
- व्यवसाय या फैक्टरी शुरू करना
इसका कारण यह है कि ये सभी कर्म भौतिक जगत के प्रतीक हैं, जबकि अधिक मास व्यक्ति को आध्यात्मिक जगत की ओर मोड़ता है।
5. मल मास में क्या करना चाहिए?
(i) विष्णु भक्ति
चूँकि यह महीना भगवान विष्णु को समर्पित है, इसलिए:
विष्णु सहस्त्रनाम पाठ
श्रीमद्भगवद् गीता
हरि नाम संकीर्तन
नारायण स्तोत्र
श्री सूक्त
गायत्री मंत्र
महामृत्युंजय मंत्र
अत्यंत शुभ माना जाता है।
(ii) दान-पुण्य
अधिक मास में दान को अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है, जैसे:
- अन्नदान
- जलदान
- वस्त्रदान
- गौ-सेवा
- ब्राह्मण भोजन
- गरीबों को भोजन कराना
- दान से मन निर्मल होता है और पापों की निवृत्ति होती है।
(iii) व्रत
अनेक लोग अधिक मास में पूर्ण मास व्रत रखते हैं—
फलाहार
एक समय भोजन
केवल सात्विक भोजन
जल-उपवास
इन व्रतों से शरीर और मन दोनों का शोधन होता है।
(iv) तीर्थ-स्नान
गंगा, नर्मदा, यमुना, गोदावरी आदि नदियों में स्नान विशेष फलदायक है।
6. मल मास का सामाजिक महत्व
भारत में चंद्र कैलेंडर पर आधारित समाज में यह महीना समय-संतुलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।
खेती के समय को व्यवस्थित रखने में
त्योहारों को ऋतुओं के अनुसार बनाए रखने में
धार्मिक कार्यक्रमों को क्रम में रखने में
सामाजिक जीवन का तालमेल बिठाने में
अधिक मास महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अधिक मास के कारण ही होली हमेशा वसंत में और दीवाली कार्तिक अमावस्या पर ही आती है।
7. मल मास और व्यक्ति का आंतरिक जीवन
यह महीना व्यक्ति को अपने भीतर झांकने का अवसर देता है।
आत्मनिरीक्षण
स्वभाव सुधार
क्रोध, लोभ, ईर्ष्या का क्षय
संतोष, करुणा और सह-अस्तित्व की भावना
मन का शुद्धिकरण
