Welcome to Ujjain Pooja Path

माँ बगलामुखी पूजन क्यों कराई जाती है?

  1.  सनातन धर्म में दशमहाविद्याओं का विशेष महत्व है। इन्हीं दस महाविद्याओं में से एक हैं माँ बगलामुखी। माँ बगलामुखी को “शत्रु-विनाशिनी” और “स्तंभन शक्ति की देवी” कहा जाता है। उनका स्वरूप अद्भुत और प्रभावशाली है। वे पीले वस्त्र धारण करती हैं, पीले आसन पर विराजमान रहती हैं और उनके हाथ में गदा होती है। वे अपने एक हाथ से शत्रु की जिह्वा पकड़कर उसे स्तंभित (निष्क्रिय) करती हैं। यही कारण है कि उन्हें वाणी, तर्क-वितर्क, शत्रु और नकारात्मक शक्तियों पर नियंत्रण की देवी माना जाता है।माँ बगलामुखी का पूजन विशेष रूप से तब कराया जाता है जब व्यक्ति जीवन में किसी प्रकार की बाधा, शत्रु बाधा, कोर्ट-कचहरी के मामले, झूठे आरोप, मानसिक तनाव या व्यापार में नुकसान जैसी समस्याओं से घिरा हो। उनकी कृपा से शत्रुओं की बुद्धि भ्रमित हो जाती है और साधक को विजय प्राप्त होती है।   शत्रु बाधा से मुक्ति के लिए
    माँ बगलामुखी पूजन का सबसे प्रमुख कारण शत्रु बाधा से मुक्ति है। यदि किसी व्यक्ति के जीवन में ऐसे लोग हों जो उसे नुकसान पहुँचाने का प्रयास कर रहे हों, पीठ पीछे षड्यंत्र रच रहे हों या झूठी बातें फैलाकर उसकी प्रतिष्ठा को हानि पहुँचा रहे हों, तो माँ बगलामुखी का पूजन हवन ,यज्ञ अत्यंत प्रभावकारी माना जाता है।
    शास्त्रों में वर्णित है कि माँ बगलामुखी शत्रु की वाणी, बुद्धि और शक्ति को स्तंभित कर देती हैं। इससे शत्रु स्वयं ही पराजित हो जाता है और साधक को मानसिक शांति  मिलती है।
  2.   कोर्ट-कचहरी और कानूनी मामलों में विजय
    आज के समय में बहुत से लोग कानूनी मामलों में उलझे रहते हैं। कई बार व्यक्ति निर्दोष होते हुए भी झूठे मुकदमों में फँस जाता है। ऐसे में माँ बगलामुखी की पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है। उनकी साधना से विरोधी पक्ष की दलीलें कमजोर हो जाती हैं और सत्य की विजय होती है।
    वकील, नेता, वक्ता और वे लोग जिनका कार्य वाणी और तर्क पर आधारित होता है, वे भी माँ बगलामुखी की उपासना करते हैं ताकि उनकी वाणी प्रभावशाली और विजयी बने।
  3.  वाणी और वाद-विवाद में सफलता
    माँ बगलामुखी को वाणी पर नियंत्रण की देवी भी कहा जाता है। यदि किसी व्यक्ति को इंटरव्यू, डिबेट, भाषण या महत्वपूर्ण मीटिंग में सफलता प्राप्त करनी हो, तो माँ की आराधना की जाती है। उनकी कृपा से व्यक्ति की वाणी में आत्मविश्वास और प्रभाव आता है।
    कई बार व्यक्ति क्रोध या तनाव में गलत शब्द बोल देता है जिससे संबंध खराब हो जाते हैं। माँ बगलामुखी की पूजा से वाणी में संयम आता है और व्यक्ति सोच-समझकर बोलता है।
  4. नकारात्मक ऊर्जा और तंत्र बाधा से रक्षा
    कई लोगों को ऐसा अनुभव होता है कि उनके जीवन में बिना कारण रुकावटें आ रही हैं, घर में कलह बढ़ रही है या अचानक से स्वास्थ्य और धन की हानि हो रही है। ज्योतिष के अनुसार यह नकारात्मक ऊर्जा या तांत्रिक बाधा का प्रभाव हो सकता है। ऐसे समय में माँ बगलामुखी का पूजन अत्यंत शक्तिशाली उपाय माना जाता है।
    माँ की साधना से नकारात्मक शक्तियाँ दूर होती हैं और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
  5.  व्यापार और करियर में उन्नति
    व्यापार में बार-बार नुकसान होना, प्रतिस्पर्धियों से परेशानी, कार्यस्थल पर विरोध या प्रमोशन में रुकावट—इन सभी समस्याओं के समाधान के लिए भी माँ   बगलामुखी की पूजा ,हवन ,यज्ञ कराई जाती है। उनकी कृपा से बाधाएँ दूर होती हैं और सफलता के मार्ग खुलते हैं।
  6. मानसिक शांति और आत्मबल
    माँ बगलामुखी की पूजा केवल बाहरी शत्रुओं के लिए ही नहीं, बल्कि आंतरिक शत्रुओं—जैसे भय, क्रोध, लोभ और भ्रम—को समाप्त करने के लिए भी की जाती है।      जब व्यक्ति का मन शांत होता है, तभी वह सही निर्णय ले पाता है।
    माँ की साधना से आत्मबल बढ़ता है, मन स्थिर होता है और जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण आता है

 माँ बगलामुखी का पूजन विशेष रूप से बगलामुखी जयंती, गुरुवार, या विशेष मुहूर्त में कराया जाता है। इस पूजा में पीले वस्त्र, पीले फूल, हल्दी की माला और बेसन के लड्डू का विशेष महत्व होता है। हल्दी को माँ का प्रिय माना जाता है, इसलिए हल्दी की माला से मंत्र पूजन,जप,हवन ,यज्ञ ,करने का विधान है।

 उनका प्रमुख मंत्र है:
“ॐ ह्लीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा।”
इस मंत्र के जप से शत्रु की वाणी और बुद्धि स्तंभित होती है और साधक को विजय प्राप्त होती है।

        निष्कर्ष:
माँ बगलामुखी पूजन जीवन की कठिन परिस्थितियों में शक्ति और संरक्षण प्रदान करने वाला एक दिव्य उपाय है। जब व्यक्ति को लगे कि चारों ओर से बाधाएँ घेर रही हैं, शत्रु सक्रिय हैं, न्याय नहीं मिल रहा या मानसिक अशांति बढ़ रही है, तब माँ की शरण में जाना अत्यंत लाभकारी माना गया है।
उनकी आराधना केवल शत्रु नाश के लिए नहीं, बल्कि आत्म-संयम, सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी की जाती है। सच्ची श्रद्धा और विश्वास के साथ  किया गया माँ बगलामुखी पूजन व्यक्ति के जीवन में नई ऊर्जा, साहस और विजय का मार्ग प्रशस्त करता है।
माँ बगलामुखी की कृपा से सभी प्रकार की बाधाएँ दूर हों और जीवन में सुख, शांति और सफलता प्राप्त हो—इसी मंगलकामना के साथ। 🙏

मंगल भात पूजा क्यों करवाई जाती है?

भारतीय ज्योतिष और सनातन परंपरा में ग्रहों का मानव जीवन पर गहरा प्रभाव माना गया है। जन्म कुंडली में उपस्थित ग्रह न केवल हमारे स्वभाव, स्वास्थ्य और करियर को प्रभावित करते हैं, बल्कि विवाह, दांपत्य जीवन और पारिवारिक सुख-शांति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन्हीं ग्रहों में से एक अत्यंत प्रभावशाली ग्रह है मंगल ग्रह। जब मंगल ग्रह कुंडली में अशुभ स्थिति में होता है, तथा जन्म कुंडली में मांगलिक दोष होने पर व्यक्ति को कई प्रकार की बाधाओं का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में मंगल दोष शांति हेतु मंगल भात पूजा करवाई जाती है।
मंगल ग्रह का ज्योतिषीय महत्व

मंगल ग्रह को ऊर्जा, साहस, पराक्रम, रक्त, भूमि, क्रोध और विवाह का कारक माना गया है। यह ग्रह व्यक्ति को नेतृत्व क्षमता, आत्मबल और साहस प्रदान करता है। लेकिन जब मंगल ग्रह अशुभ, कमजोर या दोषपूर्ण स्थिति में होता है, तो वही ऊर्जा नकारात्मक रूप में प्रकट होने लगती है।

मंगल ग्रह की अशुभ स्थिति से व्यक्ति में:

  • अत्यधिक क्रोध
  • जल्दबाज़ी में निर्णय
  • वैवाहिक तनाव
  • दुर्घटनाओं की संभावना
  • रक्त से संबंधित रोग
  • भूमि-विवाद

जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
मंगल दोष क्या है?

जब जन्म कुंडली में मंगल ग्रह 1st, 4th, 7th, 8th या 12th भाव में स्थित होता है, तो उस स्थिति को मंगल दोष (मांगलिक दोष) कहा जाता है। यह दोष विशेष रूप से विवाह से संबंधित समस्याएं उत्पन्न करता है।

मंगल दोष होने पर:

विवाह में देरी

विवाह बार-बार टूटना

पति-पत्नी में कलह

अलगाव या तलाक

जीवनसाथी के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव

देखने को मिल सकता है।

मंगल भात पूजा क्या है?

मंगल भात पूजा एक विशेष वैदिक अनुष्ठान है, जो मंगल ग्रह की शांति और मांगलिक दोष के निवारण के लिए किया जाता है। इस पूजा में भगवान शिव, मंगल ग्रह और नवग्रहों की विशेष विधि से आराधना की जाती है।

इस पूजा में भात (पका हुआ चावल) का विशेष महत्व होता है, जिसे दान और आहुति के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसलिए इसे मंगल “भात” पूजा कहा जाता है।

उज्जैन में पूजा का महत्व:

क्षिप्रा नदी का पवित्र तट

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की उपस्थिति

सिद्ध पीठ और प्राचीन वैदिक परंपराएं

यहां की गई मंगल भात पूजा को शीघ्र फलदायी माना जाता है।

मंगल भात पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि ज्योतिषीय संतुलन स्थापित करने का एक प्रभावी उपाय है। मंगल ग्रह की उग्रता को शांत कर यह पूजा जीवन में स्थिरता, सुख और शांति प्रदान करती है। विशेष रूप से विवाह और दांपत्य जीवन से जुड़ी समस्याओं में यह पूजा अत्यंत फलदायी मानी जाती है।

यदि किसी जातक की कुंडली में मंगल दोष है, तो योग्य ज्योतिषीय परामर्श के बाद उज्जैन में मंगल भात पूजा करवाना जीवन को सकारात्मक दिशा देने का श्रेष्ठ माध्यम बन सकता है।

MalMas Ka Mahatva (purushottam Mahina)

मल मास का महत्व (हिन्दू धर्म में)
मल मास को अधिक मास या पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। यह चंद्र और सूर्य वर्ष के अंतर को संतुलित करने के लिए जोड़ा जाता है।

⭐ मल मास का आध्यात्मिक महत्व
यह अत्यंत पवित्र और फलदायी मास माना जाता है।
इसे भगवान विष्णु को समर्पित किया गया है, इसलिए इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा गया।

पाप कर्मों का नाश
मल मास में की गई पूजा, व्रत, दान, जप—सभी का फल कई गुना बढ़कर मिलता है।
इसे आध्यात्मिक शुद्धि का महीना माना जाता है।

मनोकामना पूर्ति
इस मास में की गई प्रार्थना, व्रत और तप—मनोकामनाओं की पूर्ति करवाते हैं।
कहा जाता है कि साधारण महीनों की तुलना में मल मास में इच्छा जल्दी पूर्ण होती है।

विष्णु भक्ति का श्रेष्ठ समय
इस महीने में विष्णु सहस्त्रनाम, गीता पाठ, नारायण कवच, हरि मंत्र जप अत्यंत शुभ माना जाता है।

मल मास, जिसे अधिक मास, पुरुषोत्तम मास, लौंध मास, या अधिमास भी कहा जाता है, हिन्दू पंचांग का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अतिरिक्त मास है। यह चंद्र और सूर्य कैलेंडर के बीच चल रहे समय-अंतर को संतुलित करने के लिए जोड़ा जाता है। लगभग प्रत्येक 32.5 महीनों में एक अतिरिक्त महीना आता है, जिसे मल मास कहा जाता है। यद्यपि शब्द “मल” का अर्थ अशुद्ध या अतिरिक्त माना जाता है, परंतु यह महीना धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ, फलदायी, और आध्यात्मिक उन्नति देने वाला माना गया है। हिन्दू धर्मग्रंथों में जहाँ इसे प्रारंभ में अशुभ बताया गया है, वहीं बाद में इसे पुरुषोत्तम मास की उपाधि मिली, अर्थात वह महीना जिसमें भगवान विष्णु स्वयं इसे श्रेष्ठ बना देते हैं। इस प्रकार मल मास का महत्व लोक-जीवन से लेकर आध्यात्मिक साधना तक अत्यंत व्यापक है।

1. मल मास का उद्भव और वैज्ञानिक पृष्ठभूमि
हिन्दू पंचांग दो आधारों पर चलता है—

सौर (सूर्य आधारित), और

चंद्र (चंद्र आधारित)

सौर वर्ष लगभग 365 दिन का होता है, जबकि चंद्र वर्ष लगभग 354 दिनों का। दोनों में लगभग 11 दिनों का अंतर प्रतिवर्ष बढ़ता रहता है। यह अंतर करीब ढाई साल में 1 महीने (लगभग 29.5 दिन) जितना हो जाता है। इस अंतर को संतुलित करने के लिए पंचांग में एक अतिरिक्त महीना जोड़ दिया जाता है, जिसे अधिक मास या मल मास कहते हैं।

यह जोड़ निरंतरता बनाए रखने, ऋतुओं को सही समय पर आने और त्योहारों को सही तिथियों पर रखने के लिए आवश्यक है। यदि अधिक मास न जोड़ा जाए तो कुछ वर्षों में दीवाली गर्मियों में और होली वर्षा ऋतु में पड़ने लगेगी।

इस प्रकार यह मास केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि कैलेंडर को संतुलित रखने के लिए वैज्ञानिक रूप से आवश्यक है।

2. मल मास की धार्मिक कथा और पौराणिक महत्व
पौराणिक कथा के अनुसार, जब पंचांग बनाया गया तो प्रत्येक मास को एक देवता के संरक्षण में रखा गया। किन्तु अधिक मास या यह अतिरिक्त महीना किसी देवता के भाग में नहीं आया। इस कारण इसे ‘मल मास’ कहा जाने लगा और यह अपने आप को उपेक्षित व अपवित्र समझने लगा। यह भगवान विष्णु के पास जाकर बोला—

“हे प्रभु! कोई भी देवता मुझे स्वीकार नहीं करता। सभी शुभ कर्मों से मुझे दूर रखा जाता है। मानव भी मेरे महीने में विवाह, नए कर्म, या शुभ कार्य नहीं करते। कृपया मेरी रक्षा करें।”

भगवान विष्णु ने मल मास पर कृपा की और कहा—

“आज से यह मास अशुभ नहीं रहेगा। मैं स्वयं इस माह का देवता बनकर इसे पुरुषोत्तम मास का दर्जा देता हूँ। जो भी व्यक्ति इस माह में मेरी पूजा, जप, तप, दान, उपवास करेगा, उसे सामान्य महीनों से कहीं अधिक फल प्राप्त होगा।”

इस प्रकार मल मास अपवित्र से अत्यंत पवित्र मास बन गया। यही कारण है कि आज भी इसे भगवान विष्णु को समर्पित मास के रूप में माना जाता है।

3. मल मास का आध्यात्मिक महत्व
(i) साधना का श्रेष्ठ समय
अधिक मास को “आध्यात्मिक पुनर्जागरण” का महीना कहा गया है। इस दौरान प्रकृति में एक विशिष्ट सामंजस्य और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है।

जप तेज़ी से सिद्ध होता है

मंत्र जल्दी फल देते हैं

मन अधिक स्थिर रहता है

आत्मिक शुद्धि आसानी से होती है

इस माह में साधारण व्यक्ति भी साधना के माध्यम से अपनी मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति कर सकता है।

(ii) पापों का नाश
धर्मग्रंथ कहते हैं कि इस महीने का एक दिन का तप भी सामान्य समय के कई वर्षों के तप के बराबर फल दे सकता है।
जैसे:

विष्णु सहस्त्रनाम का जप

गीता पाठ

राम नाम का जप

हरि स्तोत्र और भजन

इनके द्वारा व्यक्ति कर्मजन्य पापों से मुक्त होकर आत्मिक शांति प्राप्त करता है।

(iii) इच्छा-पूर्ति का मास
पुरुषोत्तम मास में की गई प्रार्थना और व्रत को मनोकामना पूर्ति के लिए श्रेष्ठ माना गया है।
लोग इस महीने में निम्न इच्छाओं के लिए संकल्प लेते हैं—

  • विवाह
  • संतान
  • नौकरी
  • धन
  • घर
  • व्यापार में सफलता

कहते हैं कि भगवान विष्णु इस महीने में भक्तों की विशेष सुनवाई करते हैं।

4. मल मास में क्या नहीं करते?
यद्यपि यह महीना धार्मिक रूप से शुभ है, फिर भी सामाजिक और पारिवारिक शुभ कार्य परंपरागत रूप से इस महीने में नहीं किए जाते। इसका कारण यह नहीं कि यह महीना अशुभ है, बल्कि इसलिए कि यह सिर्फ आध्यात्मिक साधना के लिए सुरक्षित किया गया है।

निम्न कार्य नहीं किए जाते:

  1. विवाह
  2. गृह प्रवेश
  3. नामकरण
  4. मुंडन संस्कार
  5. नई दुकान का उद्घाटन
  6. भवन निर्माण की शुरुआत
  7. बड़े मांगलिक कार्य
  8. व्यवसाय या फैक्टरी शुरू करना

इसका कारण यह है कि ये सभी कर्म भौतिक जगत के प्रतीक हैं, जबकि अधिक मास व्यक्ति को आध्यात्मिक जगत की ओर मोड़ता है।

5. मल मास में क्या करना चाहिए?
(i) विष्णु भक्ति
चूँकि यह महीना भगवान विष्णु को समर्पित है, इसलिए:

विष्णु सहस्त्रनाम पाठ

श्रीमद्भगवद् गीता

हरि नाम संकीर्तन

नारायण स्तोत्र

श्री सूक्त

गायत्री मंत्र

महामृत्युंजय मंत्र

अत्यंत शुभ माना जाता है।

(ii) दान-पुण्य
अधिक मास में दान को अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है, जैसे:

  • अन्नदान
  • जलदान
  • वस्त्रदान
  • गौ-सेवा
  • ब्राह्मण भोजन
  • गरीबों को भोजन कराना
  • दान से मन निर्मल होता है और पापों की निवृत्ति होती है।

(iii) व्रत
अनेक लोग अधिक मास में पूर्ण मास व्रत रखते हैं—

फलाहार

एक समय भोजन

केवल सात्विक भोजन

जल-उपवास

इन व्रतों से शरीर और मन दोनों का शोधन होता है।

(iv) तीर्थ-स्नान
गंगा, नर्मदा, यमुना, गोदावरी आदि नदियों में स्नान विशेष फलदायक है।

6. मल मास का सामाजिक महत्व
भारत में चंद्र कैलेंडर पर आधारित समाज में यह महीना समय-संतुलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।

खेती के समय को व्यवस्थित रखने में

त्योहारों को ऋतुओं के अनुसार बनाए रखने में

धार्मिक कार्यक्रमों को क्रम में रखने में

सामाजिक जीवन का तालमेल बिठाने में

अधिक मास महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

अधिक मास के कारण ही होली हमेशा वसंत में और दीवाली कार्तिक अमावस्या पर ही आती है।

7. मल मास और व्यक्ति का आंतरिक जीवन
यह महीना व्यक्ति को अपने भीतर झांकने का अवसर देता है।

आत्मनिरीक्षण

स्वभाव सुधार

क्रोध, लोभ, ईर्ष्या का क्षय

संतोष, करुणा और सह-अस्तित्व की भावना

मन का शुद्धिकरण

नवरात्रि क्यों मनाई जाति हैं ?

   1. नवरात्रि क्यों मनाई जाति  हैं

नवरात्रि पर्व हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण और पवित्र त्योहार है, जो माँ दुर्गा की पूजा-अर्चना के लिए मनाया जाता है। यह पर्व विशेष रूप से शक्ति, विजय और पवित्रता का प्रतीक है। नवरात्रि का पर्व हर     साल पूरे भारत में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है, और इसका धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व है।

नवरात्रि मनाने के प्रमुख कारण और कथाएँ:

महिषासुर मर्दिनी की पूजा:
सबसे प्रमुख कथा महिषासुर की है, जो एक राक्षस था और देवताओं पर विजय प्राप्त कर चुका था। महिषासुर की अत्याचारों से त्रस्त देवता माँ दुर्गा की पूजा करते हैं, जिन्होंने 9 दिनों तक युद्ध करके       महिषासुर का वध किया। माँ दुर्गा के इन 9 रूपों की पूजा और उनके द्वारा राक्षसों पर विजय प्राप्त करने के रूप में नवरात्रि मनाई जाती है। नवरात्रि के अंतिम दिन यानी दसवें दिन को           ‘विजयदशमी’     या ‘दशहरा’ के रूप में मनाया जाता है, जो विजय का प्रतीक है।

शक्ति का पर्व:
नवरात्रि का पर्व शक्ति, समृद्धि, और आत्मबल को जागृत करने का समय है। माँ दुर्गा के विभिन्न रूपों की पूजा करने से व्यक्ति के भीतर शक्ति और आंतरिक बल का संचार होता है। यह पर्व हमें       अपनी आंतरिक शांति, आत्मविश्वास, और मानसिक शांति को सशक्त करने की प्रेरणा देता है।

रामलीला और रावण वध की परंपरा:
नवरात्रि के अंतिम दिन, दशहरे के दिन, भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था, जिससे अच्छाई की बुराई पर विजय की परंपरा स्थापित हुई। इस दिन को ‘विजयदशमी’ कहा जाता है, और इसे     रावण वध, श्रीराम के विजय और धर्म की जीत के रूप में मनाया जाता है।

पवित्रता और संयम की महत्वता:
नवरात्रि में कई लोग उपवासी रहते हैं, संयम रखते हैं, और अपने आहार-विहार में बदलाव करते हैं। यह एक प्रकार से आत्म-नियंत्रण और आत्म-संयम की साधना है, जो व्यक्ति को मानसिक शांति   और आत्म-शक्ति प्राप्त करने में मदद करती है।

विविध रूपों में देवी की पूजा:
नवरात्रि के 9 दिन में देवी दुर्गा के 9 अलग-अलग रूपों की पूजा होती है। इन रूपों में:

शैलपुत्री (पहला दिन)

ब्रह्मचारिणी (दूसरा दिन)

चन्द्रघंटा (तीसरा दिन)

कुष्मांडा (चौथा दिन)

स्कंदमाता (पाँचवाँ दिन)

कात्यायनी (छठा दिन)

कालरात्रि (सातवाँ दिन)

महागौरी (आठवाँ दिन)

सिद्धिदात्री (नौवाँ दिन)

हर रूप के साथ देवी के अलग-अलग गुण जुड़े होते हैं, जैसे ब्रह्मचारिणी रूप का संबंध तपस्या और साधना से है, वहीं कालरात्रि का रूप राक्षसों का नाश करने और बुरी शक्तियों से रक्षा करने वाला   है।

समग्र रूप से, नवरात्रि को मनाने का उद्देश्य केवल देवी के साथ आध्यात्मिक संबंध स्थापित करना नहीं है, बल्कि यह भी है कि हम अपने जीवन में अच्छाई, सत्य, और शांति को बढ़ावा दें, और अपनी   आंतरिक शक्ति को पहचानें।

 2. हर दिन अलग नौ देवियों की पूजन का क्या विधान हैं

नवरात्रि के नौ दिनों में प्रत्येक दिन नौ देवियों के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है। ये देवियाँ शक्ति, शांति, ज्ञान, और विजय की प्रतीक हैं। हर दिन इन रूपों की पूजा विशेष महत्व रखती है     और  इसके साथ कुछ विशिष्ट व्रत, उपासना, और अनुष्ठान किए जाते हैं।

यहाँ हर दिन के लिए नौ देवियों का विवरण और उनके पूजा विधि के बारे में बताया गया है:

1. पहला दिन – शैलपुत्री (Shailputri)

रूप: शैलपुत्री देवी, माँ दुर्गा के पहले रूप हैं। इनका रूप पर्वत की बेटी के रूप में होता है। ये शक्ति और स्थिरता की देवी हैं।

पूजा विधि: पहले दिन श्रद्धालु देवी शैलपुत्री की पूजा करते हैं और अपनी जीवन में शांति और स्थिरता की कामना करते हैं। इस दिन का व्रत ‘शक्तिपूजन’ के रूप में होता है, जिसमें ताम्बुल (सुपारी,   फल) और सफेद फूल अर्पित किए जाते हैं।

2. दूसरा दिन – ब्रह्मचारिणी (Brahmacharini)

रूप: ब्रह्मचारिणी देवी तपस्या और साधना की देवी हैं। यह रूप देवी दुर्गा का तपस्विनी रूप है, जो हर कार्य में संयम और ब्रह्मचर्य को बनाए रखने का प्रतीक है।

पूजा विधि: दूसरे दिन व्रति उपवासी रहते हुए माता ब्रह्मचारिणी के सामने संकल्प लेते हैं और उनसे आध्यात्मिक उन्नति की प्रार्थना करते हैं। यह दिन तपस्या और साधना के महत्व को समझने का होता     है।

3. तीसरा दिन – चन्द्रघंटा (Chandraghanta)

रूप: चन्द्रघंटा देवी का रूप बहुत ही भव्य और सौम्य है। इनके मस्तक पर चाँद का आकार होता है और ये युद्ध में विजय प्राप्त करने वाली देवी हैं।

पूजा विधि: तीसरे दिन देवी चन्द्रघंटा की पूजा की जाती है। देवी की कृपा से मानसिक और शारीरिक शक्ति प्राप्त होती है। इस दिन शंख, घंटी, और दीपक का उपयोग किया जाता है।

4. चौथा दिन – कुष्मांडा (Kushmanda)

रूप: कुष्मांडा देवी का रूप समृद्धि, सुख-समृद्धि और समग्र शांति का प्रतीक है। इनकी पूजा से सुख-शांति और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

पूजा विधि: चौथे दिन, श्रद्धालु देवी कुष्मांडा के भव्य रूप की पूजा करते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। इस दिन विशेष रूप से गुलाब, सफेद फूल और मीठे पकवान अर्पित किए       जाते हैं।

5. पाँचवां दिन – स्कंदमाता (Skandamata)

रूप: स्कंदमाता देवी के हाथों में भगवान स्कंद (कार्तिकेय) का चित्र होता है। ये मातृत्व और संरक्षण की देवी हैं।

पूजा विधि: इस दिन श्रद्धालु माँ स्कंदमाता की पूजा करते हैं, ताकि उनके जीवन में मातृत्व, प्यार और सुरक्षा की भावना विकसित हो। इस दिन भक्त मातृत्व की शक्ति को महसूस करते हैं और   आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

6. छठा दिन – कात्यायनी (Katyayani)

रूप: कात्यायनी देवी की पूजा शक्ति और वीरता की देवी के रूप में की जाती है। ये रूप भगवान कृष्ण की माँ के रूप में भी पूजे जाते हैं।

पूजा विधि: इस दिन देवी कात्यायनी की पूजा करके लोग अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन और मानसिक शांति की प्रार्थना करते हैं। ये दिन महिला शक्ति की पूजा का भी प्रतीक है, इसलिए         महिलाएं विशेष पूजा करती हैं।

7. सातवां दिन – कालरात्रि (Kalratri)

रूप: कालरात्रि देवी का रूप बेहद डरावना होता है। ये रूप राक्षसों और बुरी शक्तियों का संहार करने वाला है।

पूजा विधि: सातवे दिन, भक्त कालरात्रि देवी की पूजा करके बुराई और नकारात्मकता से छुटकारा पाने की प्रार्थना करते हैं। इस दिन विशेष रूप से दीपक जलाने और रात्रि जागरण करने की परंपरा     होती है।

8. आठवाँ दिन – महागौरी (Mahagauri)

रूप: महागौरी देवी का रूप अत्यंत सुंदर और पवित्र होता है। ये रूप देवी दुर्गा के परम पवित्र रूप का प्रतीक हैं।

पूजा विधि: इस दिन भक्त माँ महागौरी के चरणों में श्रद्धा अर्पित करते हैं और अपने जीवन से सभी कष्टों का निवारण करने के लिए प्रार्थना करते हैं। यह दिन खासकर मानसिक शांति और मानसिक   उन्नति के लिए होता है।

9. नौवाँ दिन – सिद्धिदात्री (Siddhidatri)

रूप: सिद्धिदात्री देवी सभी सिद्धियों और आशीर्वादों की देवी हैं। वे भक्तों को उनके हर प्रयास में सफलता और सिद्धि प्रदान करती हैं।

पूजा विधि: इस दिन देवी सिद्धिदात्री की पूजा करने से भक्तों को सफलता, समृद्धि और संतुष्टि प्राप्त होती है। नौवे दिन को देवी की पूजा करके लोग अपने जीवन के सभी अनुष्ठान और कार्यों में   सफलता की कामना करते हैं।

नवरात्रि की विशेष पूजा विधियाँ:

व्रत: नवरात्रि के दौरान लोग उपवासी रहते हैं, विशेष आहार लेते हैं (जैसे फलाहार) और देवी की पूजा करते हैं।

अर्चना: प्रत्येक दिन देवी के विभिन्न रूपों की पूजा में मंत्रों का उच्चारण और दीप जलाना शामिल होता है।

ध्यान और साधना: भक्त प्रतिदिन ध्यान, जप, और साधना करते हैं ताकि उनकी आध्यात्मिक उन्नति हो सके।

भक्ति और श्रद्धा: भक्त नवरात्रि के इन 9 दिनों में अपने जीवन में भक्ति और श्रद्धा को बढ़ाते हैं, और देवी की कृपा प्राप्त करने की कोशिश करते हैं।

नवरात्रि का यह 9 दिन का पर्व व्यक्ति को आत्म-निर्माण, शक्ति, और शांति के मार्ग पर अग्रसर करता है।

 3.नवरात्रि में उपवास क्यों करना चाहिए

नवरात्रि में उपवास (व्रत) रखने की परंपरा हिंदू धर्म में बहुत पुरानी है और इसके पीछे धार्मिक, आध्यात्मिक, और वैज्ञानिक कारण होते हैं। नीचे विस्तार से बताया गया है कि नवरात्रि में उपवास क्यों   करना चाहिए:

🔱 1. धार्मिक और आध्यात्मिक कारण:
✨ देवी की उपासना:

नवरात्रि माता दुर्गा और उनके नौ रूपों की उपासना का पर्व है। उपवास से व्यक्ति अपने शरीर और मन को शुद्ध करता है जिससे वह पूरी श्रद्धा और एकाग्रता से पूजा कर सके।

🧘‍♂ मन और इंद्रियों का नियंत्रण:

उपवास से इंद्रियों पर नियंत्रण आता है और साधक अपने भीतर के आत्मबल को पहचानता है।

🍃 2. आयुर्वेदिक और वैज्ञानिक कारण:
🌿 शरीर की डिटॉक्स प्रक्रिया:

नवरात्रि साल में दो बार आती है — चैत्र (मार्च-अप्रैल) और शारदीय (सितंबर-अक्टूबर) में। ये मौसम बदलने का समय होता है, जब पाचन शक्ति कमजोर होती है। उपवास करने से शरीर को विषैले   पदार्थों से मुक्ति मिलती है और पाचन तंत्र को आराम मिलता है।

🌞 मौसमी संक्रमण से सुरक्षा:

मौसम बदलते समय बीमारियाँ (जैसे सर्दी, फ्लू, डायरिया) अधिक होती हैं। उपवास करके हल्का और सात्विक आहार लेने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

🧘‍♀ 3. मानसिक शांति और अनुशासन:

उपवास से व्यक्ति संयम और अनुशासन का पालन करना सीखता है।

मानसिक एकाग्रता बढ़ती है।

ध्यान और भक्ति में मन लगता है।

🍎 4. सात्विक भोजन का महत्व:

नवरात्रि में लोग अनाज, प्याज, लहसुन, मांसाहार आदि से परहेज़ करके फल, दूध, साबूदाना, कुट्टू, सिंघाड़ा आदि सात्विक आहार लेते हैं। इससे शरीर और मन दोनों की शुद्धि होती है।

💡 निष्कर्ष:

नवरात्रि में उपवास रखना सिर्फ धार्मिक कर्तव्य नहीं है, बल्कि यह शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धि का माध्यम भी है। यह हमें आत्म-संयम, भक्ति, और स्वास्थ्य का संतुलन सिखाता है।

 4. चैत्र नवरात्रि के बाद दशहरा क्यों मनाया जाता हैं

नवरात्रि के बाद दशहरा (या विजयदशमी) मनाया जाता है, जो एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिंदू त्योहार है। यह त्योहार न केवल राक्षसों पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है, बल्कि धर्म की जीत और अधर्म  पर विजय का भी प्रतीक है। दशहरा का पर्व विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोणों से मनाया जाता है, और इसके पीछे कई प्रमुख कथाएँ और मान्यताएँ हैं।

दशहरे के मनाने के प्रमुख कारण:
1. राम और रावण की महाकाव्य कथा (रामायण)

दशहरा का प्रमुख धार्मिक कारण रामायण से जुड़ा हुआ है। इस दिन भगवान श्रीराम ने रावण, जो कि लंका का राक्षसी सम्राट था, का वध किया। रावण ने माँ सीता का अपहरण किया था और श्रीराम ने    एक महान युद्ध के बाद रावण को हराया।

कथा का सार:

रावण, जो अत्यंत शक्तिशाली और ज्ञानवान था, ने अपने अहंकार और अनीति के कारण देवताओं और लोगों को दुखी किया था।

भगवान श्रीराम, जो कि सत्य और धर्म के प्रतीक हैं, ने रावण का वध करके यह सिद्ध किया कि अधर्म कभी भी धर्म पर विजय प्राप्त नहीं कर सकता।

इस दिन श्रीराम की विजय और रावण के वध के रूप में अच्छाई की बुराई पर जीत को मनाया जाता है। दशहरा इसी विजय का प्रतीक है।

2. माँ दुर्गा और महिषासुर मर्दिनी (शक्ति की विजय)

नवरात्रि के नौ दिनों के बाद दशहरा के दिन माँ दुर्गा की पूजा होती है। माँ दुर्गा ने महिषासुर नामक राक्षस का वध किया था, जो कि देवताओं को प्रताड़ित कर रहा था। माँ दुर्गा की विजय को भी     दशहरे    के दिन के रूप में मनाया जाता है। इस दिन, शक्ति और रक्षात्मक ऊर्जा की पूजा की जाती है, और यह हमें यह सिखाता है कि अच्छाई और शांति की शक्ति हमेशा बुराई को हराती है।

3. दुष्टों का नाश और अच्छाई की स्थायी विजय

दशहरा को मनाने का एक और कारण यह है कि यह एक सांस्कृतिक संदेश देता है। यह समय है जब लोग अपने जीवन से नकारात्मकता और बुराई को निकालकर अच्छाई, सदाचार, और नैतिकता     का पालन करने का संकल्प लेते हैं।

लोग इस दिन रावण का पुतला जलाते हैं, जो राक्षसी मानसिकता, अहंकार, और अधर्म का प्रतीक है। पुतला जलाने से यह दर्शाया जाता है कि बुराई का अंत निश्चित है और सत्य की विजय होती है।

यह विशेष रूप से आध्यात्मिक रूप से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह हमें यह याद दिलाता है कि हर व्यक्ति के अंदर बुराई और अच्छाई दोनों का संघर्ष होता है। इस दिन, हम यह संकल्प लेते हैं कि   हम  अपनी आंतरिक बुराई को समाप्त करके अच्छाई का पालन करेंगे।

4. कृषि और नए कार्यों की शुरुआत

दशहरा, विशेष रूप से व्यापारिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। भारत के कई हिस्सों में यह दिन नवीन कार्यों की शुरुआत के रूप में मनाया जाता है।

यह दिन खरीदारी का दिन होता है, खासकर व्यापारियों के लिए। इस दिन लोग अपनी पुरानी चीज़ों को बदलकर नयी चीज़ें खरीदते हैं और नए कार्यों की शुरुआत करते हैं। यह दिन विशेष रूप से   संगठनों और कृषि से जुड़े लोगों के लिए महत्व रखता है।

कुछ जगहों पर यह दिन विजय उत्सव के रूप में मनाया जाता है, और सार्वजनिक समारोह में रावण के पुतले का दहन होता है, जिससे जीवन के कष्ट और कठिनाइयों का अंत और नए कार्यों की  शुरुआत होती है।

5. कृष्ण की विजय और राक्षसों का वध

कुछ स्थानों पर दशहरा को भगवान कृष्ण की विजय के रूप में भी मनाया जाता है, विशेष रूप से मथुरा और वृंदावन में।

इस दिन को कृष्ण के राक्षसों पर विजय और गोपियाँ की रक्षा के रूप में मनाया जाता है।

कृष्ण ने कंस और अन्य राक्षसों का वध करके धर्म की स्थापना की थी, और इस दिन को इस प्रकार के विजय पर्व के रूप में मनाया जाता है।

दशहरे का सांस्कृतिक महत्व:

रावण दहन: दशहरे के दिन रावण के पुतले का दहन होता है, जो प्रतीक है कि बुराई का अंत हो चुका है। लोग इस दिन को खुशी और उल्लास के साथ मनाते हैं, क्योंकि यह बुराई पर अच्छाई की जीत   का प्रतीक है।

रात्रि का जागरण और नृत्य: दशहरे की रात को कई स्थानों पर रात्रि जागरण और नृत्य का आयोजन होता है, जहां लोग रामलीला, गीत-भजन, और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों का हिस्सा बनते हैं।

सामाजिक समागम: दशहरा लोगों के बीच एक सामाजिक समागम का अवसर होता है। यह दिन परिवारों और दोस्तों के साथ मिलकर खुशियाँ बाँटने, अच्छे कार्यों की शुरुआत करने, और नए उत्साह   के साथ जीवन की राह पर चलने का होता है।

निष्कर्ष:

दशहरा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह एक जीवन दर्शन है जो हमें अपने जीवन में बुराई और नकारात्मकता से लड़ने की प्रेरणा देता है। यह अच्छाई की, सत्य की, और धर्म की विजय का     प्रतीक है। नवरात्रि के बाद यह दिन हमें अपने भीतर की बुराई को समाप्त करने और अच्छाई को बढ़ाने का अवसर प्रदान करता है।

क्या काल सर्प दोष हमेशा हानिकारक है?

(क्या काल सर्प दोष हमेशा हानिकारक है?)
लोगों के बीच में अक्सर यह भ्रान्ति पाई जाती है कि काल सर्प दोष जातक की कुंडली में होने से उसके जीवन में बहुत सारे कष्ट आते है और सब तरह से परेशान रहता है | हालांकि ये सब जानकारी कटु और सच है, किन्तु इसके अलावा काल सर्प दोष का दूसरा पक्ष भी है | आपको यह जानकार बड़ा आश्चर्य होगा कि काल सर्प दोष कुंडली पर हो और उससे जीवन में लाभ होते हों | हम हर जगह अक्सर इस दोष से होने वाले दुष्प्रभावों के बारे में पढ़ते व सुनते है किन्तु यदि यह दोष किसी जातक के कुंडली पर उपस्थित हो, तो यह योग उसे लाभ भी प्रदान कर सकता है | आइये जानते है ऐसी ही कुछ रोचक जानकारी के बारे में |
काल सर्प दोष वाले जातक अपने जीवन में अपार सफलता हासिल करते है यदि राहु उनकी कुंडली में लाभकारी स्थिति में हो | काल सर्प दोष वाले जातक ज्यादा मेहनती , ईमानदार और साहसी हो सकते है, इस प्रकार से वो अपने जीवन में सफलता हासिल कर पाते है |
जातक एकाग्रचित होकर अपना कार्य करते है |जातक साहसी होते है और इस वजह से वो अपने जीवन में अधिक जोखिम उठाने को तैयार रहते है | इस कारण उन्हें सफलता भी मिलती है |
जातक अपनी कमजोरियों से लड़ते है और एक बेहतर अवतार में निखार कर आते है |
जातक की कुंडली में यदि राहु अच्छी स्थिति में हो तो जातक की कल्पना शांति बहुत अच्छी होती है |

(कालसर्प दोष के कुप्रभावों से बचने के लिए क्या करें:)
जातक अपने जीवन शैली के अनुसार उपाय करवा सकता है | राहू केतू के उपायों में सर्वोत्तम है भगवान शिव की आराधना करना| यदि जातक शिव की आराधना करने हेतु बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन शहर में मां शिप्रा तट के समीप पहुँचता है और काल सर्प योग नामक पूजा करता है तो उसे कालसर्प दोष से मुक्ति मिल सकती है | यह पूजा विद्वान ब्राह्मण द्वारा वैदिक मंत्रों के माध्यम से विधिवत संपन्न कराई जाती हैं| ऐसे ही किसी जानकार पंडित से पहले आप अपनी कुंडली के अनुसार पूजा का मुहूर्त तय कर लें | हम आपको कालसर्प पूजा को श्री पंडित ऋतिक शर्मा गुरु जी से करवाने का सुझाव देंगे | गुरु जी को कालसर्प पूजा तथा अन्य पूजाएं का अपार अनुभव प्राप्त है और शास्त्रों एवं कर्मकांडो के महाज्ञाता भी है |
कालसर्प पूजा से पहले आपको अपनी जन्मकुंडली हमारे द्वारा निःशुल्क परामर्श लेकर ही आपकी कुंडली में उपस्थित दोषों का निराकरण करके विस्तार से समाधान किया जाता हैं इस पूजा के अलावा पंडित जी आपको अन्य उपाय जैसे नित्य शिव पूजा, मंत्रोच्चारण, पीपल के वृक्ष की पूजा आदि के बारे में भी बताएँगे एवम् विशेष मंत्र भी बताए जाते हैं
कुछ जातक थोड़ी सी जानकारी के पश्चात खुद ये निर्णय ले लेते है कि उनको क्या करना चाहिए या फिर क्या नहीं | हालांकि हम सब यह मानते है कि हर विषय में राय किसी ज्ञाता से ही लेनी चाहिए | इससे समय भी बचता है और समय पर आपको परेशानी का उचित हल भी मिल जाता है | यदि आप अपना समय और पैसा बचाते हुए कालसर्प दोष का हल चाहते है तो आप तुरंत पंडित ऋतिक शर्मा जी से नि:शुल्क राहु केतु दोष निवारण पूजा कि जानकारी ले सकते है |

(कैसे होता है राहु केतु दोष ?)
जब किसी जातक की कुंडली में उसके सभी ग्रह राहु और केतु के बीच आ जाते है, जिसमे राहु सर और केतु पूँछ की तरफ होता है, इस तरह की दशा में जातक की कुंडली में राहु केतु दोष माना जाता है | जो ग्रह और केतु के बीच होते है और अलग अलग घर में जा सकते है और उनके घरों की स्थिति के हिसाब से इस दोष के प्रभाव होते है | इस दोष से रहित जातक के जीवन में बहुत सारी बाधाएं उत्पन्न होती है, यही कारण है कि इस दोष को इतना बुरा समझा जाता है | यह दोष ग्रहों की स्तिथि के अनुसार १२ प्रकार से होता है |

(क्या है राहु केतु दोष से होने वाली समस्याएं ?)
जिस जातक की कुंडली में यह दोष होता है, वह अपने जीवन में कई बाधाओं से घिरा रहता है | इन समस्याओं में प्रमुखतः शादी में रुकावट / देरी , वैवाहिक जीवन में तनाव, व्यापार में हानि, नौकरी पाने में दिक्कत, स्वास्थय सम्बन्धी परेशानियां, मानसिक तनाव, आर्थिक तंगी हैं |
जातक अपने अथक प्रयास के बावजूद भी इच्छानुसार सफलता नहीं पाता और इससे उसको लगातार निराशा का सामना करना होता है | जातक के मन में कई बार ऐसे विचार उत्पन्न होते है कि आखिर उसे ही क्यों निराशा का सामना कर पड़ता है ? यदि वह नौकरी करे तो वह उसे पदोनत्ति में देरी होती है या फिर लगातार अपनी नौकरी का स्थान बदलना पड़ता है | यदि वह व्यवसाय करे तो उसे लगातार हानि होती है | इससे उसके जीवन में अड़चन पैदा होती है | उसे मानसिक और शारीरिक कष्ट होते है |
कालसर्प दोष होने से शत्रुओं की संख्या बढ़ जाती हैं शत्रु परेशान करने लगते हैं।सेहत में गिरावट आने लगती है। कालसर्प दोष होने व्यक्ति को बुरे सपने आने लगते हैं जिसमें बार-बार मृत्यु के सपने, सपनों में सांपों का दिखाई देना शुरू हो जाता है। व्यापार में लगातार हानि होने लगती है। विवाह में देर होती है। मानसिक एवं शारीरिक कष्ट बढ़ने लगते हैं। पैतृक संपत्तियां धीरे-धीरे नष्ट होने लगती है। धोखा मिलने की संभावना बढ़ जाती है। बुरे स्वप्न एवं अनिद्रा रोग की समस्या का सामना करना पड़ता है और कोर्ट कचहरी का सामना करना पड़ता है।
काल सर्प दोष, ज्योतिष में एक ऐसी स्थिति है जो कुंडली में राहु और केतु के बीच सभी ग्रहों के आने से बनती है, जिसके कारण व्यक्ति को जीवन में कई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। (काल सर्प दोष के लक्षण:)
बार-बार बुरे सपने आना:
सपने में सांपों का दिखना, सांपों से डर लगना, या सांपों द्वारा पीछा किए जाने जैसे सपने आना.
मानसिक तनाव और बेचैनी:
हमेशा तनाव महसूस करना, चिंता करना, और मन में अशांति रहना.
स्वास्थ्य समस्याएं:
त्वचा रोग, सिरदर्द, या अन्य स्वास्थ्य समस्याएं होना.
नौकरी और व्यवसाय में बाधाएं:
नौकरी में समस्याएं आना, व्यवसाय में हानि होना, या काम में सफलता न मिलना.
विवाह और प्रेम संबंधों में समस्याएं:
विवाह में देरी होना, वैवाहिक जीवन में कलह होना, या प्रेम संबंधों में असफलता मिलना.
संतान प्राप्ति में बाधा:
संतान होने में कठिनाई आना, या संतान के स्वास्थ्य में समस्या होना.
आर्थिक तंगी:
धन की कमी होना, या आर्थिक रूप से परेशान रहना.
नींद में परेशानी:
नींद न आना, या नींद में बार-बार जागना.
सफलता में बाधा:
किसी भी काम में सफलता प्राप्त करने में कठिनाई होना. काल सर्प दोष के प्रभाव व्यक्ति के जीवन के विभिन्न पहलुओं पर पड़ सकते हैं, जैसे:
शिक्षा:
शिक्षा में बाधा, पढ़ाई में मन न लगना.
करियर:
नौकरी में समस्याएं, व्यवसाय में हानि.
विवाह:
विवाह में देरी, वैवाहिक जीवन में कलह.
स्वास्थ्य:
स्वास्थ्य समस्याएं, मानसिक तनाव.
आर्थिक स्थिति:
आर्थिक तंगी, धन की कमी.
परिवार:
परिवार में कलह, माता-पिता से संबंध खराब होना.
मानसिक स्थिति:
मानसिक तनाव, बेचैनी, नकारात्मक विचार.
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि काल सर्प दोष के लक्षण हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकते हैं, और यह आवश्यक नहीं है कि यदि किसी व्यक्ति में ये लक्षण हैं तो उसे काल सर्प दोष ही हो। यदि आपको काल सर्प दोष के बारे में अधिक जानकारी चाहिए, तो एक ज्योतिषी से सलाह लेना उचित होगा।
काल सर्प दोष का प्रमुख उपाय बाबा महाकाल की नगरी शिप्रा के समीप उज्जैन मध्यप्रदेश में काल सर्प दोष की पूजा करवाना चाहिए जातक इसके बारे में ज्यादा जानकारी गुरु जी ऋतिक शर्मा जी से नि:शुल्क प्राप्त कर सकते है एवं इनकी परामर्शनुसार पूजा कर सकते है | उज्जैन में काल सर्प पूजा बुक करे|
ज्योतिषाचार्य पंडित ऋतिक शर्मा जी
उज्जैन बाबा महाकाल की नगरी
(मध्यप्रदेश)
संपर्क करें:7879782191

काल सर्प दोष क्या हैं?

काल सर्प दोष क्या हैं? कुंडली में कालसर्प दोष कैसे बनता हैं ?
काल सर्प दोष एक ऐसा दोष हैं जो कि राहु और केतु के मध्य में सूर्य ,चंद्रमा,मंगल, बुध,गुरु, शुक्र, शनि ग्रह का कुंडली में प्रवेश होने पर काल सर्प दोष उत्पन्न होता हैं। राहु सर्प का मुख हैं और केतु पुंछ हैं
जब राहु सर्प का मुख होने के कारण शुभ ग्रहों का फल ग्रहण करके अशुभ फल प्रदान करते हैं। जिस जातक की जन्म कुंडली में काल सर्प दोष बनता हैं अथवा उत्पन्न होता हैं। उस जातक को अनेकों प्रकार के कष्ट बाधा आती हैं।
कालसर्प दोष जातक की जन्म कुंडली में एक कष्टकारी स्थिति है | कष्टकारी से यह तात्पर्य है कि जातक तो अपने जीवन में सिर्फ इस दशा के होने पर कई ऐसे कष्टों का सामना करना पड़ता है जिससे जातक खुद को परेशान समझने लगता है और नकारात्मक ऊर्जा आने लगती हैं इस प्रकार की स्थिति में जातक की कुंडली में सभी ग्रह राहु और केतु के बीच में आकर एक ऐसी परिस्थिति बनाते है, जिससे जातक के अथक प्रयास भी व्यर्थ जाते है और ये प्रयास उन्हें जीवन में सफलता प्रदान नहीं कर पाते |
इस दोष से कई नकारात्मक प्रभाव होते है लेकिन मुख्यतः इस दोष का प्रभाव जातक के शरीर, मनदशा, वैवाहिक जीवन एवं धन पर पड़ता है | जातक कभी आर्थिक तंगी से गुजरता है तो कभी शारीरिक रूप से परेशान रहता है | जातक को न ही नौकरी पेशे में सफलता मिलती है और न ही वह व्यापार में लाभ कमा पाता है |
यदि कोई जातक यह जानना चाहता है कि ऐसे कौन सी स्थिति बनती है जब कालसर्प दोष उसकी कुंडली में परिलक्षित होता है तो जातक अपनी कुंडली में किसी ज्योतिष के मदद से यह देख पायेगा कि जब सूर्य मंडल के सातों गृह उसकी कुंडली में राहु एवं केतु के बीच में आ जाते है और आधी कुंडली ग्रह रहित होती है और उसकी उनकी कुंडली में इस दशा को ही कालसर्प दोष कहते है | इसे हम पूर्ण कालसर्प योग भी कह सकते हैं किन्तु यदि एक भी ग्रह राहु केतु अक्ष रेखा के बाहर होता है तब जातक के कुन्डली में पूर्ण कालसर्प दोष नहीं होता हैं|
ग्रहों के स्थिति के अनुसार कालसर्प योग मुख्यतः १२ प्रकार के होते है और हर दोष का प्रभाव जातक के जीवन में भिन्न-भिन्न होता हैं| कोई स्थिति जीवन साथी के लिए बुरी हो सकती हैं तो कोई श्रेष्ठ हो सकती हैं।
काल सर्प दोष के प्रकार:
जैसा की हमने पाठको को बताया की ग्रहों की स्तिथि के अनुसार जातक पर काल सर्प दोष के प्रभाव होते हैं | इन्ही ग्रहो की स्तिथि यह सुनिश्चित करती हैं कि जातक की कुंडली में स्थित काल सर्प दोष कौन से प्रकार का हैं | यह कुल १२ प्रकार का होता हैं|
1.(अनन्त कालसर्प दोष) :
जब जातक की कुंडली में राहु लग्न में हो तथा केतु सप्तम में उपस्थित हो एवं बाकी सारे ग्रह इनके बीच में हों तो इस प्रकार का कालसर्प दोष होता है।
2.(कुलिक कालसर्प दोष ):
जब जातक की कुंडली में राहु दूसरे घर में तथा केतु अष्टम स्थान में उपस्थित हो एवं बाकी सारे ग्रह इनके बीच में ही हो तो इस प्रकार का कालसर्प दोष होता है।
3.(वासुकी कालसर्प दोष ):
जब जातक की कुंडली में राहु तीसरे घर में तथा केतु नवम स्थान में उपस्थित हो एवं बाकी सारे ग्रह इनके बीच में ही हो तो इस प्रकार का कालसर्प दोष होता है।
4.(शंखपाल कालसर्प दोष) :
जब जातक की कुंडली में राहु चौथे घर में और केतु दशम स्थान में उपस्थित हो एवं बाकी सारे ग्रह इनके बीच में ही हो तो इस प्रकार का कालसर्प दोष होता है।
5.(पद्म कालसर्प दोष) :
जब जातक की कुंडली में राहु पंचम घर में और केतु एकादश स्थान में उपस्थित हो एवं बाकी सारे ग्रह इनके बीच में ही हो तो इस प्रकार का कालसर्प दोष होता है।
6.(महापद्म कालसर्प दोष ):
जब जातक की कुंडली में राहु छठे घर में और केतु बारहवे स्थान में उपस्थित हो एवं बाकी सारे ग्रह इनके बीच में ही हो तो इस प्रकार का कालसर्प दोष होता है।
7.(तक्षक कालसर्प दोष) :
जब जातक की कुंडली में राहु सप्तम घर में और केतु लग्न में उपस्थित हो एवं बाकी सारे ग्रह इनके बीच में ही हो तो इस प्रकार का कालसर्प दोष होता है।
8.(कर्कोटक कालसर्प दोष) :
जब जातक की कुंडली में राहु अष्टम घर में और केतु दूसरे स्थान में उपस्थित हो एवं बाकी सारे ग्रह इनके बीच में ही हो तो इस प्रकार का कालसर्प दोष होता है।
9.(शंखचूड़ कालसर्प दोष ):
जब जातक की कुंडली में राहु नवम घर में और केतु तीसरे स्थान में उपस्थित हो एवं बाकी सारे ग्रह इनके बीच में ही हो तो इस प्रकार का कालसर्प दोष होता है।
10.(घातक कालसर्प दोष ):
जब जातक की कुंडली में राहु दशम घर में और केतु चौथे स्थान में उपस्थित हो एवं बाकी सारे ग्रह इनके बीच में ही हो तो इस प्रकार का कालसर्प दोष होता है।
11.(विषधार कालसर्प दोष):
जब जातक की कुंडली में राहु ग्यारवे घर में और केतु पांचवें स्थान में उपस्थित हो एवं बाकी सारे ग्रह इनके बीच मंं ही हो तो इस प्रकार का कालसर्प दोष होता है।
12. (शेषनाग कालसर्प दोष):
जब जातक की कुंडली में राहु बारहवें घर में और केतु छठें स्थान में उपस्थित हो एवं बाकी सारे ग्रह इनके बीच में ही हो तो इस प्रकार का कालसर्प दोष होता है।
काल सर्प दोष से लाभ तथा हानि:
लोगों के बीच में अक्सर यह भ्रान्ति पाई जाती है कि काल सर्प दोष जातक की कुंडली में होने से उसके जीवन में बहुत सारे कष्ट आते है और सब तरह से परेशान रहता है | हालांकि ये सब जानकारी कटु और सच है, किन्तु इसके अलावा काल सर्प दोष का दूसरा पक्ष भी है | आपको यह जानकार बड़ा आश्चर्य होगा कि काल सर्प दोष कुंडली पर हो और उससे जीवन में लाभ होते हों | हम हर जगह अक्सर इस दोष से होने वाले दुष्प्रभावों के बारे में पढ़ते व सुनते है किन्तु यदि यह दोष किसी जातक के कुंडली पर उपस्थित हो, तो यह योग उसे लाभ भी प्रदान कर सकता है | आइये जानते है ऐसी ही कुछ रोचक जानकारी के बारे में |
काल सर्प दोष वाले जातक अपने जीवन में अपार सफलता हासिल करते है यदि राहु उनकी कुंडली में लाभकारी स्थिति में हो |
•काल सर्प दोष वाले जातक ज्यादा मेहनती , ईमानदार और साहसी हो सकते है, इस प्रकार से वो अपने जीवन में सफलता हासिल कर पाते है |
•जातक एकाग्रचित होकर अपना कार्य करते है |
•जातक साहसी होते है और इस वजह से वो अपने जीवन में अधिक जोखिम उठाने को तैयार रहते है | इस कारण उन्हें सफलता भी मिलती है |
•जातक अपनी कमजोरियों से लड़ते है और एक बेहतर अवतार में निखार कर आते है |
•जातक की कुंडली में यदि राहु अच्छी स्थिति में हो तो जातक की कल्पना शांति बहुत अच्छी होती है |

गुरुपूर्णिमा का महत्व:

गुरु पूर्णिमा, जिसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है, भारतीय संस्कृति में एक महत्वपूर्ण पर्व है जो गुरुओं (शिक्षकों) के सम्मान में मनाया जाता है। यह पर्व आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है और इसका आध्यात्मिक और शैक्षणिक दोनों ही महत्व है। गुरु पूर्णिमा पर, शिष्य अपने गुरुओं के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं, उनका आशीर्वाद लेते हैं और उनके द्वारा दिए गए ज्ञान के लिए आभार व्यक्त करते हैं।
गुरु पूर्णिमा का वास्तविक अर्थ:
गुरु पूर्णिमा का वास्तविक अर्थ है “गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण और आभार” का पर्व। “गुरु” शब्द का अर्थ है “अंधेरे से प्रकाश की ओर ले जाने वाला”। गुरु वह व्यक्ति है जो अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाता है, जो जीवन के सही मार्ग को दिखाता है और सही दिशा में मार्गदर्शन करता है।
गुरु पूर्णिमा का महत्व:
आध्यात्मिक महत्व:
गुरु पूर्णिमा का आध्यात्मिक महत्व बहुत गहरा है। इस दिन, शिष्य अपने गुरुओं के प्रति अपनी श्रद्धा और भक्ति व्यक्त करते हैं, उनके आशीर्वाद की कामना करते हैं और उनके द्वारा दिए गए ज्ञान के लिए आभार व्यक्त करते हैं।
शैक्षणिक महत्व:
गुरु पूर्णिमा शैक्षणिक क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण है। यह दिन शिक्षकों और गुरुओं को सम्मानित करने और उनके प्रति आभार व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है, जिन्होंने छात्रों को ज्ञान और कौशल प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
सामाजिक महत्व:
गुरु पूर्णिमा एक सामाजिक उत्सव भी है जो समुदाय में एकता और सद्भाव को बढ़ावा देता है। इस दिन, लोग एक साथ आते हैं, गुरुओं का सम्मान करते हैं और एक-दूसरे के साथ ज्ञान और अनुभव साझा करते हैं।
व्यक्तिगत महत्व:
गुरु पूर्णिमा व्यक्तिगत रूप से भी महत्वपूर्ण है। यह दिन हमें अपने जीवन में गुरु के महत्व को याद दिलाता है और हमें उनके मार्गदर्शन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।
गुरु पूर्णिमा का उत्सव:
गुरु पूर्णिमा के दिन, शिष्य अपने गुरुओं के पास जाते हैं, उन्हें उपहार भेंट करते हैं, और उनके प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। वे गुरुओं के प्रवचन सुनते हैं, उनके द्वारा दिए गए उपदेशों का पालन करते हैं, और उनके मार्गदर्शन में अपने जीवन को बेहतर बनाने का संकल्प लेते हैं।
गुरु पूर्णिमा का इतिहास:
गुरु पूर्णिमा का इतिहास बहुत प्राचीन है। यह पर्व महर्षि वेद व्यास के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है, जिन्हें वेदों का संकलनकर्ता माना जाता है। वेद व्यास को प्रथम गुरु माना जाता है और इसलिए, गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है।
गुरु पूर्णिमा का प्रभाव:
गुरु पूर्णिमा का प्रभाव बहुत व्यापक है। यह न केवल आध्यात्मिक और शैक्षणिक क्षेत्र में, बल्कि सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन में भी सकारात्मक प्रभाव डालता है। यह पर्व हमें ज्ञान, मार्गदर्शन और प्रेरणा प्रदान करता है, और हमें अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करता है।
निष्कर्ष:
गुरु पूर्णिमा एक महत्वपूर्ण पर्व है जो गुरुओं के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का एक अवसर है। यह पर्व हमें ज्ञान, मार्गदर्शन और प्रेरणा प्रदान करता है, और हमें अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करता है।
गुरु पूर्णिमा का वास्तविक अर्थ है, गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण और आभार व्यक्त करना, और उनके द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलना।

भगवान महाकाल की कृपा कैसे प्राप्त करे:

श्रावण मास में रुद्राभिषेक के लाभ :

श्रावण मास हिन्दू पंचांग का अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी महीना है। यह माह संपूर्ण रूप से भगवान शिव को समर्पित होता है। इस मास में भगवान शिव की पूजा, व्रत, उपवास और विशेष रूप से “रुद्राभिषेक” करने का अत्यधिक महत्व है। यह एक ऐसा धार्मिक अनुष्ठान है जिसमें भगवान शिव का जल, दूध, दही,घी, शहद, शक्कर, गंगाजल आदि से अभिषेक किया जाता है। यह प्रक्रिया न केवल आध्यात्मिक रूप से लाभकारी होती है बल्कि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव डालती है।

रुद्राभिषेक क्या है? रुद्राभिषेक एक वैदिक अनुष्ठान है, जिसमें भगवान शिव के रुद्र रूप की पूजा की जाती है और उनके ऊपर विभिन्न प्रकार की शुद्ध एवं पवित्र सामग्रियों से अभिषेक किया जाता है। यह अभिषेक विशेष मंत्रों और विधियों के साथ किया जाता है, जैसे कि महामृत्युंजय मंत्र, रुद्र सूक्त, शिवोपासना मंत्र आदि।

रुद्राभिषेक के प्रमुख लाभ:

  1. आध्यात्मिक उन्नति:
    • आत्मा की शुद्धि होती है।
    • भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है।
    • साधना और ध्यान में प्रगति होती है।
  2. ग्रह दोषों से मुक्ति:
    • शनि, राहु, केतु और चंद्र दोषों की शांति होती है।
    • कालसर्प दोष, पितृ दोष आदि का निवारण होता है।
  3. मानसिक शांति और तनाव से राहत:
    • रुद्राभिषेक से मानसिक संतुलन प्राप्त होता है।
    • चिंता, भय, और अवसाद जैसी मानसिक स्थितियाँ कम होती हैं।
  4. स्वास्थ्य में सुधार:
    • शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
    • रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
    • आयु, बल और तेज में वृद्धि होती है।
  5. विवाह और संतान संबंधी बाधाओं से मुक्ति:
    • विवाह में आ रही अड़चनें दूर होती हैं।
    • दंपति को संतान प्राप्ति का वरदान मिलता है।
  6. आर्थिक और व्यवसायिक लाभ:
    • कार्यों में सफलता मिलती है।
    • धन, संपत्ति और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
    • व्यवसाय में वृद्धि और नौकरी में उन्नति होती है।
  7. पारिवारिक सुख और शांति:
    • परिवार में आपसी प्रेम और सामंजस्य बढ़ता है।
    • कलह, क्लेश और गलतफहमियाँ समाप्त होती हैं।
  8. पितृदोष और कर्मदोष का निवारण:
    • पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है।
    • पिछले जन्मों के पापों का क्षालन होता है।

रुद्राभिषेक की सामग्री और उनका महत्व:

  • गंगाजल: पवित्रता और शुद्धता का प्रतीक
  • दूध: शांति और करुणा का भाव
  • दही: उर्वरता और प्रजनन शक्ति में वृद्धि
  • घी: स्वास्थ्य और तेज में वृद्धि
  • शहद: मधुरता और समृद्धि का संकेत
  • बेलपत्र: भगवान शिव को प्रिय, मनोकामना पूर्ति हेतु
  • भस्म: वैराग्य और मोक्ष का प्रतीक
  • धतूरा, आक: शिव के विशेष प्रिय पुष्प

रुद्राभिषेक की विधि:

  1. प्रातः स्नान कर शुद्ध वस्त्र पहनें।
  2. शिवलिंग पर शुद्ध जल तथा गंगाजल चढ़ाएं।
  3. पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद,  शक्कर,  गंगाजल) से अभिषेक करें।
  4. बेलपत्र, फूल, फल अर्पित करें।
  5. महामृत्युंजय मंत्र, रुद्राष्टक, शिव चालीसा का पाठ करें।
  6. दीपक जलाकर आरती करें और प्रसाद वितरण करें।

श्रावण मास में विशेष उपाय:

  • हर सोमवार को व्रत रखें।
  • “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप कम से कम 108 बार करें।
  • शिव चालीसा और रुद्राष्टक का पाठ करें।
  • शिवलिंग पर दूध या जल के साथ काले तिल मिलाकर अभिषेक करें।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लाभ:

  • मंत्र उच्चारण से उत्पन्न ध्वनि तरंगें मस्तिष्क और वातावरण को शुद्ध करती हैं।
  • जल, दूध आदि प्राकृतिक तत्वों के स्पर्श से शरीर और मन को शीतलता मिलती है।
  • एकाग्रता बढ़ती है और मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता है।

श्रावण मास में रुद्राभिषेक   सर्वोतम आध्यात्मिक साधना है जो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव लाने में सक्षम है। रुद्राभिषेक के माध्यम से व्यक्ति ईश्वर से सीधा जुड़ाव महसूस करता है और जीवन में सुख, शांति, समृद्धि, स्वास्थ्य और मोक्ष की प्राप्ति करता है। इसलिए इस श्रावण मास में आप भी भगवान शिव का रुद्राभिषेक करें और अपने जीवन को श्रेष्ठ और पावन बनाएं |भगवान् महादेव की कृपा प्राप्त करने का सहज एवं सर्वोतम विधि है|

श्रावण मास में भगवान शिव की उपासना का विशेष महत्व है।

 

 

श्रावण के महीने में उपवास करना, जिसे श्रावण सोमवार व्रत भी कहा जाता है,

हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है। यह भगवान शिव को समर्पित है और इस दौरान उपवास करने से कई आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक लाभ मिलते हैं।


श्रावण मास में उपवास के लाभ:


भगवान शिव की कृपा: श्रावण का महीना भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है, और इस दौरान उपवास करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।
पाप का नाश और मनोकामना पूर्ति:
श्रावण मास में उपवास करना पापों का नाश करने वाला और मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला माना जाता है।
मानसिक और शारीरिक शुद्धि:
उपवास के दौरान, मन और शरीर को शुद्ध करने पर ध्यान केंद्रित किया जाता है, जिससे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।
रोगों से मुक्ति:
श्रावण मास में उपवास करने से रोगों से मुक्ति मिलती है और स्वास्थ्य में सुधार होता है।
आत्म-नियंत्रण और दृढ़ संकल्प:
उपवास एक कठिन साधना है जो आत्म-नियंत्रण और दृढ़ संकल्प को विकसित करने में मदद करती है।
सकारात्मक ऊर्जा का संचार:
उपवास के दौरान, शरीर से नकारात्मक ऊर्जा बाहर निकल जाती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
जीवन में सुख-शांति:
श्रावण मास में उपवास करने से जीवन में सुख-शांति बनी रहती है और तरक्की के अवसर प्राप्त होते हैं।
वैवाहिक जीवन में खुशहाली:
श्रावण मास में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने से वैवाहिक जीवन में खुशहाली आती है।
आध्यात्मिक विकास:
उपवास आध्यात्मिक विकास के लिए एक महत्वपूर्ण साधन है, जो व्यक्ति को अपने भीतर की ओर मुड़ने और आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करने में मदद करता है।
श्रावण मास में उपवास के पीछे की कथा:
पौराणिक कथाओं के अनुसार, श्रावण मास में ही भगवान शिव ने समुद्र मंथन से निकले विष को पिया था, जिससे सृष्टि की रक्षा हुई थी। विष के प्रभाव से भगवान शिव व्याकुल हो गए थे, और उस समय देवताओं ने उन पर जल अर्पित किया था, जिससे उन्हें शांति मिली थी। तभी से श्रावण मास में भगवान शिव को जल चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई।
श्रावण मास में उपवास के नियम:
व्रत का संकल्प:
श्रावण मास में उपवास शुरू करने से पहले, भगवान शिव का ध्यान करके व्रत का संकल्प लेना चाहिए।
सात्विक भोजन:
उपवास के दौरान, सात्विक भोजन करना चाहिए, जिसमें फल, दूध, दही, और अनाज शामिल हैं।
शिवलिंग पर जल:
प्रतिदिन शिवलिंग पर जल चढ़ाना चाहिए।
मंत्रों का जाप:
भगवान शिव के मंत्रों का जाप करना चाहिए, जैसे “ॐ नमः शिवाय”।
दान:
गरीबों और जरूरतमंदों को दान करना चाहिए।
शारीरिक और मानसिक शुद्धि:
उपवास के दौरान, शारीरिक और मानसिक शुद्धि पर ध्यान देना चाहिए।
निष्कर्ष:
श्रावण मास में उपवास करना एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है, जो भगवान शिव को प्रसन्न करने, पापों का नाश करने, मनोकामनाओं को पूर्ण करने, और आध्यात्मिक विकास के लिए किया जाता है। यह उपवास मानसिक और शारीरिक शुद्धि के साथ-साथ जीवन में सुख-शांति और समृद्धि भी लाता है।

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