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मंगल भात पूजा क्यों करवाई जाती है?

भारतीय ज्योतिष और सनातन परंपरा में ग्रहों का मानव जीवन पर गहरा प्रभाव माना गया है। जन्म कुंडली में उपस्थित ग्रह न केवल हमारे स्वभाव, स्वास्थ्य और करियर को प्रभावित करते हैं, बल्कि विवाह, दांपत्य जीवन और पारिवारिक सुख-शांति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन्हीं ग्रहों में से एक अत्यंत प्रभावशाली ग्रह है मंगल ग्रह। जब मंगल ग्रह कुंडली में अशुभ स्थिति में होता है, तथा जन्म कुंडली में मांगलिक दोष होने पर व्यक्ति को कई प्रकार की बाधाओं का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में मंगल दोष शांति हेतु मंगल भात पूजा करवाई जाती है।
मंगल ग्रह का ज्योतिषीय महत्व

मंगल ग्रह को ऊर्जा, साहस, पराक्रम, रक्त, भूमि, क्रोध और विवाह का कारक माना गया है। यह ग्रह व्यक्ति को नेतृत्व क्षमता, आत्मबल और साहस प्रदान करता है। लेकिन जब मंगल ग्रह अशुभ, कमजोर या दोषपूर्ण स्थिति में होता है, तो वही ऊर्जा नकारात्मक रूप में प्रकट होने लगती है।

मंगल ग्रह की अशुभ स्थिति से व्यक्ति में:

  • अत्यधिक क्रोध
  • जल्दबाज़ी में निर्णय
  • वैवाहिक तनाव
  • दुर्घटनाओं की संभावना
  • रक्त से संबंधित रोग
  • भूमि-विवाद

जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
मंगल दोष क्या है?

जब जन्म कुंडली में मंगल ग्रह 1st, 4th, 7th, 8th या 12th भाव में स्थित होता है, तो उस स्थिति को मंगल दोष (मांगलिक दोष) कहा जाता है। यह दोष विशेष रूप से विवाह से संबंधित समस्याएं उत्पन्न करता है।

मंगल दोष होने पर:

विवाह में देरी

विवाह बार-बार टूटना

पति-पत्नी में कलह

अलगाव या तलाक

जीवनसाथी के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव

देखने को मिल सकता है।

मंगल भात पूजा क्या है?

मंगल भात पूजा एक विशेष वैदिक अनुष्ठान है, जो मंगल ग्रह की शांति और मांगलिक दोष के निवारण के लिए किया जाता है। इस पूजा में भगवान शिव, मंगल ग्रह और नवग्रहों की विशेष विधि से आराधना की जाती है।

इस पूजा में भात (पका हुआ चावल) का विशेष महत्व होता है, जिसे दान और आहुति के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसलिए इसे मंगल “भात” पूजा कहा जाता है।

उज्जैन में पूजा का महत्व:

क्षिप्रा नदी का पवित्र तट

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की उपस्थिति

सिद्ध पीठ और प्राचीन वैदिक परंपराएं

यहां की गई मंगल भात पूजा को शीघ्र फलदायी माना जाता है।

मंगल भात पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि ज्योतिषीय संतुलन स्थापित करने का एक प्रभावी उपाय है। मंगल ग्रह की उग्रता को शांत कर यह पूजा जीवन में स्थिरता, सुख और शांति प्रदान करती है। विशेष रूप से विवाह और दांपत्य जीवन से जुड़ी समस्याओं में यह पूजा अत्यंत फलदायी मानी जाती है।

यदि किसी जातक की कुंडली में मंगल दोष है, तो योग्य ज्योतिषीय परामर्श के बाद उज्जैन में मंगल भात पूजा करवाना जीवन को सकारात्मक दिशा देने का श्रेष्ठ माध्यम बन सकता है।

श्रावण मास में भगवान शिव की उपासना का विशेष महत्व है।

 

 

श्रावण के महीने में उपवास करना, जिसे श्रावण सोमवार व्रत भी कहा जाता है,

हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है। यह भगवान शिव को समर्पित है और इस दौरान उपवास करने से कई आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक लाभ मिलते हैं।


श्रावण मास में उपवास के लाभ:


भगवान शिव की कृपा: श्रावण का महीना भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है, और इस दौरान उपवास करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।
पाप का नाश और मनोकामना पूर्ति:
श्रावण मास में उपवास करना पापों का नाश करने वाला और मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला माना जाता है।
मानसिक और शारीरिक शुद्धि:
उपवास के दौरान, मन और शरीर को शुद्ध करने पर ध्यान केंद्रित किया जाता है, जिससे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।
रोगों से मुक्ति:
श्रावण मास में उपवास करने से रोगों से मुक्ति मिलती है और स्वास्थ्य में सुधार होता है।
आत्म-नियंत्रण और दृढ़ संकल्प:
उपवास एक कठिन साधना है जो आत्म-नियंत्रण और दृढ़ संकल्प को विकसित करने में मदद करती है।
सकारात्मक ऊर्जा का संचार:
उपवास के दौरान, शरीर से नकारात्मक ऊर्जा बाहर निकल जाती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
जीवन में सुख-शांति:
श्रावण मास में उपवास करने से जीवन में सुख-शांति बनी रहती है और तरक्की के अवसर प्राप्त होते हैं।
वैवाहिक जीवन में खुशहाली:
श्रावण मास में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने से वैवाहिक जीवन में खुशहाली आती है।
आध्यात्मिक विकास:
उपवास आध्यात्मिक विकास के लिए एक महत्वपूर्ण साधन है, जो व्यक्ति को अपने भीतर की ओर मुड़ने और आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करने में मदद करता है।
श्रावण मास में उपवास के पीछे की कथा:
पौराणिक कथाओं के अनुसार, श्रावण मास में ही भगवान शिव ने समुद्र मंथन से निकले विष को पिया था, जिससे सृष्टि की रक्षा हुई थी। विष के प्रभाव से भगवान शिव व्याकुल हो गए थे, और उस समय देवताओं ने उन पर जल अर्पित किया था, जिससे उन्हें शांति मिली थी। तभी से श्रावण मास में भगवान शिव को जल चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई।
श्रावण मास में उपवास के नियम:
व्रत का संकल्प:
श्रावण मास में उपवास शुरू करने से पहले, भगवान शिव का ध्यान करके व्रत का संकल्प लेना चाहिए।
सात्विक भोजन:
उपवास के दौरान, सात्विक भोजन करना चाहिए, जिसमें फल, दूध, दही, और अनाज शामिल हैं।
शिवलिंग पर जल:
प्रतिदिन शिवलिंग पर जल चढ़ाना चाहिए।
मंत्रों का जाप:
भगवान शिव के मंत्रों का जाप करना चाहिए, जैसे “ॐ नमः शिवाय”।
दान:
गरीबों और जरूरतमंदों को दान करना चाहिए।
शारीरिक और मानसिक शुद्धि:
उपवास के दौरान, शारीरिक और मानसिक शुद्धि पर ध्यान देना चाहिए।
निष्कर्ष:
श्रावण मास में उपवास करना एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है, जो भगवान शिव को प्रसन्न करने, पापों का नाश करने, मनोकामनाओं को पूर्ण करने, और आध्यात्मिक विकास के लिए किया जाता है। यह उपवास मानसिक और शारीरिक शुद्धि के साथ-साथ जीवन में सुख-शांति और समृद्धि भी लाता है।

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